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Mahashivratri 2026: डमरू-त्रिशूल से लेकर त्रिपुंड तक... जानें भगवान शिव के प्रतीकों का क्या है मतलब और महत्व?

Lord Shiv Symbols: इस साल महाशिवरात्रि 15 फरवरी को है. शिव पुराण के मुताबिक इसी दिन महादेव अपने ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए थे. भगवान शिव के अनके प्रतीक हैं. आइए इन प्रतीकों का अर्थ और रहस्य जानते हैं.

Lord Shiv Lord Shiv

सनातन धर्म में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है. हर साल यह पर्व फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है.  इस साल महाशिवरात्रि 15 फरवरी दिन रविवार को है. शिव पुराण के मुताबिक इसी दिन महादेव अपने ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए थे. भगवान शिव का स्वरूप हिंदू धर्म के सभी भगवानों में सबसे निराला है. महादेव के सिर पर लंबी जटाएं हैं, जिनमें से गंगा निकलती है. मस्तक पर चंद्र विराजमान हैं. महादेव की तीन आंखें हैं और गले में वह रूद्राक्ष के साथ-साथ सर्प भी धारण करते हैं. शरीर पर भस्म लगाते हैं, एक हाथ में डमरू तो दूसरे में त्रिशूल है. महाशिवरात्रि के अवसर पर आइए माहदेव के प्रतीकों का अर्थ और रहस्यों के बारे में जानते हैं. 

डमरू
महादेव ही नृत्य-संगीत के प्रवर्तक हैं. भोलेनाथ के डमरू में न केवल सातों सुर हैं बल्कि उसके अंदर वर्णमाला भी है. डमरू शिव जी की सृष्टि की ध्वनि का प्रतीक माना गया है. यह नाद ब्रह्म और जीवन की शुरुआत का संकेत देता है. शिव जी का डमरू बजाना आनंद और मंगल का द्योतक है. वे डमरू बजाकर भी खुश होते हैं और डमरू सुनकर भी. हर दिन घर में शिव स्तुति डमरू बजाकर की जाए तो घर में कभी अमंगल नहीं होता है.

त्रिशूल
महादेव का प्रमुख अस्त्र त्रिशुल है. त्रिशूल के तीन तिनके सत, रज और तम गुणों के संतुलन के बारे में बताते हैं. किसी को त्रिशूल तभी धारण करना चाहिए जब मन, वचन और कर्म पर पूर्ण नियंत्रण हो. त्रिशूल भूत, वर्तमान और भविष्य की ओर भी संकेत करता है. शिव भगवान के त्रिशूल के सामने  दुनिया की कोई भी शक्ति टिक नहीं सकती है. भगवान शिव का त्रिशूल हर व्यक्ति को उसके कर्म के अनुसार दंड देता है. घर में सुख समृद्धि के लिए मुख्य द्वार के ऊपर बीचों बीच त्रिशूल लगाएं या बनाएं

तीसरी आंख
भगवान शिव की तीन आंखें हैं. माथे पर स्थित तीसरी आंख ज्ञान का सर्वोच्च प्रतीक बताई जाती है. यह आंख अज्ञानता, बुराई और भ्रम का नाश करती है. व्यक्ति के अंतर्ध्यान में लीन होने के बाद ये आंख खुलती है. इससे विवेक की शक्ति का संदेश मिलता है.

रुद्राक्ष 
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि महादेव के आभूषण रुद्राक्ष की उत्पत्ति उनके अश्रुओं से हुई है. रुद्राक्ष को प्राचीन काल से आभूषण के रूप में, सुरक्षा के लिए, ग्रह शांति के लिए और आध्यात्मिक लाभ के लिए प्रयोग किया जाता रहा है. मुख्य रूप से 16 प्रकार के रुद्राक्ष पाए जाते हैं, लेकिन 12 मुखी रुद्राक्ष विशेष रूप से प्रयोग में आते हैं. रुद्राक्ष कलाई, कंठ और हृदय पर धारण किया जा सकता है. इसे कंठ प्रदेश तक धारण करना सर्वोत्तम होगा. कलाई में 12, कंठ में 35 और हृदय पर  रुद्राक्ष के 108 दानों का माला धारण करना चाहिए. एक दाना भी धारण कर सकते हैं पर यह दाना हृदय तक होना चाहिए तथा लाल धागे में होना चाहिए.


त्रिपुंड
महादेव सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण तीनों ही गुणों को नियंत्रित करने के कारण त्रिपुंड तिलक प्रयोग करते हैं. यह त्रिपुंड सफेद चंदन का होता है. कोई भी व्यक्ति जो शिव का भक्त हो, त्रिपुंड का प्रयोग कर सकता है. त्रिपुंड के बीच में लाल रंग का बिंदु, विशेष दशाओं में ही लगाना चाहिए. ध्यान या मंत्र जाप करने के समय त्रिपुंड लगाने के परिणाम अत्यंत शुभ होते हैं.

भस्म 
महादेव इस दुनिया के सारे आकर्षणों से मुक्त हैं. उनके लिए ये दुनिया, मोह-माया, सबकुछ राख के समान है. सबकुछ एक दिन भस्मीभूत होकर समाप्त हो जाएगा. शिव जी का भस्म से भी अभिषेक होता है, जिससे वैराग्य और ज्ञान की प्राप्ति होती है. शिव जी द्वारा लपेटा गया भस्म जीवन के क्षणभंगुरता और वैराग्य की याद दिलाता है. महिलाओं को भस्म से अभिषेक नहीं करना चाहिए.

सर्प
महादेव के गले में लिपटा सर्प कुंडालिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है. भगवान शिव का ये प्रतीक संकेत देता है कि व्यक्ति को अहंकार से ऊपर उठकर सांसारिक बंधनों से मुक्त होना चाहिए. ये चेतना की जागृति का भी संकेत देता है.

अर्धचंद्र और नंदी
शिव के जटाओं पर विराजमान अर्धचंद्र समय का सूचक माना जाता है. ये समय पर नियंत्रण, मन की एकाग्रता और भावनात्मक संतुलित जीवन का संकेत देता है. नंदी शिव के वाहन होने के साथ-साथ उनके परम भक्त भी हैं. नंदी से समर्पण, धैर्य, शक्ति और अडिग भक्ति का संदेश मिलता है.