शिवरात्रि की पूजा (AI Generated Image)
शिवरात्रि की पूजा (AI Generated Image)
कश्मीर में शिवरात्रि के अवसर पर भगवान शिव की पूजा बहुत धूम-धाम से की जाती है. उनके लिए यह त्यौहार वैसा है, जैसे बिहार के लोगों के लिए छठ पूजा और महाराष्ट्र वालों के लिए गणेश उत्सव. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह हुआ था, जिसे आज भी लोग अगल-अलग जगह पर धूम-धाम से मनाते हैं.
हाल ही में मेरी मुलाकात कश्मीर में रहने वाले लोगों से हुई. जैसे-जैसे हमारी बातें आगे बढ़ी उन्होंने अपने कल्चर के बारे में बहुत कुछ बताया. लेकिन जब उन्होंने शिवरात्रि के विशेष पूजा के बारे में बताया, तो मैं थोड़ा असमंजस में पड़ गई. क्योंकि उन्होंने बताया कि उनके वहां माहाशिवरात्रि के पूजा में भगवान शिव को प्रसाद के रूप में नॉन वेज आइटम चढ़ाया जाता है.
हालांकि उन्होंने इसके पीछे कई तर्क और कारण भी बताए कि क्यों वह माहाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को नॉनवेज आइटम का भोग लगाते हैं.
इस तरह शुरू होती है पूजा
पूजा वाले दिन परिवार के सभी लोग नहा कर पूजा वाले स्थान को सजाते हैं. घर की महिलाएं इस दिन तरह-तरह के व्यंजन भगवान को भोग लगाने के लिए पकाती हैं. इसी के साथ वह चिकन और मछली भी भगवान को चढ़ाने के लिए पकाती हैं. इस दिन नॉनवेज के साथ जो सबसे जरूरी आइटम है, वह है अखरोट का फला. कश्मीर के स्थानीय लोग पूजा में सभी पकवान के साथ अखरोट को जरूर रखते हैं. अखरोट शिवरात्रि के पूजा के दिन हर घर में देखने को मिलता है. ज्यादा तर इस पूजा को वह इंसान करता है, जो घर का सबसे बड़ा होता है.
परंपरा के पीछे का सांस्कृतिक सच
उन्होंने आगे बताया कि स्थानीय मान्यताओं में नॉन वेज का भोग भगवान शिव के उग्र स्वरूप यानी वटुक भैरव, और माता पार्वती के सम्मान से जुड़ा माना जाता है. वहीं कुछ और स्थानीय लोगों का कहना था कि ये भोग भगवान शिव को नहीं, बल्कि उनके साथ माता पार्वती के अन्य स्वरूप और गण-प्रेत को चढ़ाया जाता है. कश्मीरी हिन्दू समुदाय में यह प्रथा 'रीत' यानी पारंपरिक रिवाज का हिस्सा है. यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और क्षेत्रीय पूजा पद्धति की पहचान मानी जाती है.
परिवार और आस्था का मेल
इस दिन तैयार किया गया भोग पूजा के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. इसे परिवार के साथ मिलकर खाना एकता और परंपरा का प्रतीक माना जाता है. यह परंपरा दिखाती है कि भारत में आस्था के रूप अलग हो सकते हैं, लेकिन भावना एक ही रहती हैं, भगवान के प्रति श्रद्धा और परिवार का आपसी जुड़ाव.
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