Harishankar Mishra, Senior Journalist and Political Analyst
Harishankar Mishra, Senior Journalist and Political Analyst
किसी भी समाज में प्रेम, सहयोग और समरसता का वातावरण तब स्वतः निर्मित होता है, जब व्यक्ति अपने अहंकार का त्याग कर भक्ति का पथ अपनाता है. कांवड़ यात्रा इसी सत्य का सजीव प्रतीक है. मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली सांस्कृतिक चेतना की यह एक विराट यात्रा है, जिसमें जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति और सामाजिक भेदभाव गौण हो जाते हैं.
कांवड़ यात्रा हमारे लिए यह बड़ी सीख भी है कि सामाजिक समरसता किसी उपदेश से नहीं, बल्कि साझा आस्था, सहभागिता और परस्पर सम्मान से विकसित होती है और इसे वर्तमान में प्रत्यक्ष रूप में देखा भी जा सकता है. जबकि एक साथ हजारों लोग कंधे पर गंगाजल लिए शिवालयों की ओर बढ़ रहे हैं. विविधताओं के बीच एकात्मता का यह दृश्य इस सावन में जीवंत हो उठा है. प्रेम, सेवा, सह-अस्तित्व और सामाजिक समरसता पर टिकी हुई यह श्रद्धा यात्रा वह आध्यात्मिक शक्ति है, जो लोगों को समाज और राष्ट्र के व्यापक हित से जोड़ती है. इस सामूहिक अनुशासन के पीछे एक साक्षा पहचान है-भोला. यानि वह संज्ञा जो मनुष्य को शिव से एकाकार करती है.
‘भोला’ कोई साधारण संबोधन नहीं है. यह बराबरी का संवाद है. कांवड़ उठाते ही श्रद्धालु का नाम, उसका कुल, उसकी आर्थिक हैसियत गौण हो जाती है. सड़क किनारे सेवा शिविर में एक करोड़पति व्यापारी का बेटा और एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा एक ही पंगत में बैठकर बराबरी से भोजन करते हैं. यह सिर्फ भूख मिटाना भर नहीं हैं. यह सदियों पुरानी सामाजिक दूरियों को पाटने का एक मौन प्रयास है और आस्था की स्वाभाविक शक्ति से यह भाव जन्म लेता है.
योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस सामाजिक आयाम को गहराई से समझा है और यही कारण है कि कांवड़ यात्रा को व्यवस्थागत समर्थन लगातार दिया जा रहा है. योगी सरकार की दृष्टि में यह यात्रा ऐसा सामाजिक अवसर है जहां समाज अपने भीतर की खाइयों को स्वयं पाटने का काम करता है. सड़कों की मरम्मत, सुरक्षा व्यवस्था, चिकित्सा शिविर, पेयजल और विश्राम स्थलों की व्यवस्था, यह सब एक तरह से सामाजिक समरसता के ढांचे को मजबूती देने का प्रयास है.
इस समरसता का एक और भावनात्मक पक्ष हिंदू-मुस्लिम सहभागिता के रूप में दिखाई देता है. बरेली, मेरठ, मुजफ्फरनगर और दिल्ली के कई कस्बों में कांवड़ बनाने का काम पीढ़ियों से मुस्लिम कारीगरों के हाथों में रहा है. बांस को मोड़ना, रंगीन कागज और कपड़े से सजावट करना, घंटियां टांकना, यह हुनर उन परिवारों की जीविका का हिस्सा है, जो साल भर सावन का इंतजार करते हैं. उम्मीद के इस भाव के साथ कि सावन आए और उनकी कारीगरी किसी शिवभक्त के कंधे की शोभा बने. यह भारतीय समाज की उस गहरी बुनावट का प्रमाण है, जहां श्रद्धा और आजीविका एक-दूसरे से जुड़ते हैं.
यात्रा के दौरान सामाजिक समरसता के अन्य बिंदु भी देखने को मिलते हैं. कई कस्बों में मुस्लिम परिवार अपने घरों के बाहर कांवड़ियों के लिए पानी और शरबत की व्यवस्था करते हैं. कुछ जगहों पर मस्जिद परिसर में थके यात्रियों को विश्राम की अनुमति दी जाती है. यात्रा के दौरान उभरने वाली यह सहजता दिखाती है कि आस्था और मानवता, राजनीतिक विमर्श से कहीं गहरे स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. फिर भी कुछ लोग प्रश्न उठाते हैं कि क्या यह समरसता समाज में स्थायी छाप भी छोड़ जाती है? इसका उत्तर है कि मानव मन स्मृतियों से बनता है और हम अपनी यात्रा के अनुभव कभी नहीं भूलते. यात्रा के अनुभव समाज की सामूहिक चेतना में धीरे-धीरे जमा होते रहते हैं. सामाजिक बदलाव ऐसे ही संचित अनुभवों से आता है, थोड़ा धीमे-धीमे, लेकिन निश्चित रूप से.
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो भी कांवड़ यात्रा हमें समरसता से ओतप्रोत करती है. शिव स्वयं समरसता के प्रतीक हैं. वह श्मशान में विराजते हैं और कैलाश पर भी, वह भस्म रमाते हैं और चंद्रमा भी धारण करते हैं, उनके गले में सर्प है और जटाओं से गंगा प्रवाहित होती है. शिव को विरोधाभासों का देवता कहा जाता है. वह कल्याण भी करते हैं और विध्वंस भी. कांवड़िया जब अपने कलश में गंगाजल भरता है, तब उसे अहसास होता है कि उसके भीतर की सारी भिन्नताएं उस जल में समाहित हो रही हैं. इसके बाद उसके शरीर के साथ ही उसकी आत्मा भी यात्रा करती है. वह आत्मा जो किसी जाति, किसी वर्ग, किसी संप्रदाय को नहीं जानती.
इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा, आर्थिक अवसर, न्यायसंगत नीतियां और निरंतर सामाजिक संवाद, यह सब मिलकर परिवर्तन लाते हैं, लेकिन कांवड़ यात्रा जैसे आयोजन वह भूमि तैयार करते हैं, जिस पर बड़े सामाजिक परिवर्तन के बीज बोए जा सकते हैं. योगी सरकार में इस यात्रा के लिए जो प्रतिबद्धता दिखाई देती है, उसके मूल में यही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसके लिए सारी व्यवस्थाएं पूरी कर एक तरह से गहरा सामाजिक निवेश करते हैं, जो भविष्य की पीढ़ी के लिए आधार के रूप में कार्य करेगा.
वस्तुतः समरसता एक ऐसा अनुभव है, जिसे जीना पड़ता है, बांटना पड़ता है, कंधे पर उठाना पड़ता है. यह यात्रा हर वर्ष याद दिलाती है कि विभाजन की रेखाएं मनुष्य की बनाई हुई हैं, जबकि साझी श्रद्धा, साझी प्यास, साझी थकान और साझा विश्राम, यह सब हमारी सामाजिक एकता के प्रमाण हैं. ‘बोल बम’ की गूंज केवल शिव का आह्वान नहीं, बल्कि उस समाज का आह्वान भी है जो अपने भीतर एकत्व, समरसता और आत्मबोध की चाह रखता है. यह उद्घोष हमें स्मरण कराता है कि शिव अंतर्मन में विद्यमान उस चेतना के प्रतीक हैं जो भेदभाव से ऊपर उठकर समता, करुणा और लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त करती है. अहंकार, स्वार्थ और विकारों का परित्याग करने को प्रेरित करती है. जब मन निर्मल हो, व्यवहार करुणामय हो और जीवन लोककल्याण के संकल्प से जुड़ जाए, तभी शिव की उपासना पूर्ण होती है. यही ‘बोल बम’ का सनातन संदेश है.
(Disclaimer: ये लेखक के अपने निजी विचार हैं.)
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