माइक्रोप्लास्टिक (AI MADE IMAGE)
माइक्रोप्लास्टिक (AI MADE IMAGE)
अब तक प्लास्टिक को सिर्फ जमीन, नदी और समुद्र को गंदा करने वाला खतरा माना जाता था, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक और बड़ा खुलासा किया है. हाल में आई एक स्टडी में पता चला है कि हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक धरती की गर्मी बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि ये छोटे-छोटे प्लास्टिक कण सूरज की गर्मी को सोखकर ग्लोबल वार्मिंग को और तेज कर रहे हैं.
माइक्रोप्लास्टिक किसे कहते हैं?
माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के बेहद छोटे टुकड़े होते हैं, जिनका आकार 5 मिलीमीटर से भी कम होता है. बड़े प्लास्टिक कचरे के टूटने, कपड़ों के रेशों, कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स और टायर घिसने से ये कण बनते हैं. आज ये हवा, पानी और मिट्टी हर जगह फैल चुके हैं.
200 कोयला प्लांट जितने खतरनाक
शोधकर्ताओं ने माइक्रोप्लास्टिक के असर की तुलना ब्लैक कार्बन यानी कालिख से की है. रिपोर्ट के मुताबिक इन कणों का असर दुनिया के करीब 200 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों जितनी गर्मी पैदा करने के बराबर माना जा रहा है. हालांकि यह प्रदूषण के दूसरे बड़े स्रोतों से कम है, लेकिन वैज्ञानिक इसे नजरअंदाज करने लायक नहीं मान रहे.
माइक्रोप्लास्टिक कैसे बढ़ा रहे हैं धरती की गर्मी?
नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक सूरज की रोशनी को सोख लेते हैं. इससे वायुमंडल में गर्मी बढ़ती है और तापमान ऊपर जाने लगता है. वैज्ञानिकों ने बताया कि कुछ कण सूरज की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेजते हैं, लेकिन ज्यादातर माइक्रोप्लास्टिक गर्मी रोकने का काम कर रहे हैं. यही वजह है कि अब इन्हें भी धरती को गर्म करने वाले कारकों में गिना जा रहा है.
इस रंग के प्लास्टिक हैं सबसे ज्यादा खतरनाक
स्टडी में यह बात भी सामने आई कि हर माइक्रोप्लास्टिक एक जैसा असर नहीं डालता. काले, लाल, नीले और पीले रंग के प्लास्टिक कण सबसे ज्यादा गर्मी सोखते हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार रंगीन और काले माइक्रोप्लास्टिक बिना रंग वाले कणों की तुलना में करीब 75 गुना ज्यादा गर्मी पकड़ सकते हैं.
भविष्य को लेकर बढ़ी वैज्ञानिकों की चिंता
वैज्ञानिकों का कहना है कि मौजूदा क्लाइमेट मॉडल में माइक्रोप्लास्टिक से होने वाली इस अतिरिक्त गर्मी को शामिल ही नहीं किया गया है. यानी असली खतरा अभी हमारी सोच से बड़ा हो सकता है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि प्लास्टिक जल्दी खत्म नहीं होता और दशकों तक वातावरण में बना रहता है.
शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सिर्फ शुरुआत है और अभी इस विषय पर और रिसर्च की जरूरत है. उनका मानना है कि प्लास्टिक अब सिर्फ कचरे की समस्या नहीं रहा, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन का भी बड़ा कारण बनता जा रहा है.
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