Body Psychology While Talking
Body Psychology While Talking
किसी सीरियस बातचीत के दौरान आपने देखा होगा कि कुछ लोग अचानक अपनी आवाज धीमी या थोड़ी भारी कर लेते हैं. कई बार हमें लगता है कि सामने वाला शायद शांत रहने की कोशिश कर रहा है. लेकिन साइकोलॉजी के मुताबिक आवाज का बदलना सिर्फ शांत होने का इशारा नहीं है. बोलने का तरीका, आवाज, बोलने की स्पीड, रुकने का समय और आवाज का लेवल सामने वाले के इमोशन और सोच के बारे में कई इशारे देता है.
जब बातचीत किसी सीरियस या पर्सनल टॉपिक पर पहुंचती है, तो इंसान का बोलने का तरीका भी बदल सकता है. वह धीरे बोल सकता है, शब्दों के बीच ज्यादा रुक सकता है या आवाज को कम कर सकता है. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि वह बात को सोच-समझकर कहना चाहता है, इमोशन को काबू में रखना चाहता है या बातचीत को ज्यादा पर्सनल रखना चाहता है.
किसी सीरियत बात के दौरान आवाज धीमी करने से बातचीत का माहौल भी बदल सकता है. सामने वाला ज्यादा ध्यान से सुनने लगता है और कई बार करीब आकर बात करता है. यानी धीमी आवाज सामने वाले को यह एहसास करा सकती है कि बात महत्वपूर्ण और पर्सनल है.
कम या भारी आवाज को लोग कई बार ताकत, ओवर पावर या कॉन्फिडेंस से जोड़ते हैं. आवाज की डेप्थ और सोसायटी के बीच कनेक्शन भी देखा गया है. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि कम आवाज में बोलने वाला व्यक्ति हमेशा कॉन्फिडेंस वाला या दूसरों पर हावी होने वाला है.
साइकोलॉजी के अनुसार किसी व्यक्ति की नॉर्मल आवाज से ज्यादा जरूरी उसका अचानक बदला हुआ अंदाज हो सकता है. अगर कोई व्यक्ति आमतौर पर तेज बोलता है, लेकिन किसी गंभीर बात पर अचानक धीमा बोलने लगे, तो यह ज्यादा ध्यान, भावनाओं को संभालने या बात की गंभीरता दिखाने का संकेत हो सकता है.
यह समझना जरूरी है कि आवाज के बदलाव का एक ही मतलब नहीं होता. कोई व्यक्ति घबराहट में धीरे बोल सकता है, कोई भरोसा दिलाने के लिए और कोई सिर्फ इसलिए क्योंकि उसकी आवाज स्वाभाविक रूप से धीमी है. इसलिए किसी की आवाज सुनकर तुरंत उसके इरादे का फैसला करना सही नहीं है. बातचीत की स्थिति और बाकी हाव-भाव को भी समझना जरूरी है.